|अधर्मी मन |

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Written by: Raj Kumar

अधर्मी मन

आज शाम किसी फलित पलक पर

उसकी शीतल छाया के साथ

मेरा मन-मिलाप पर था

उसकी एक आशा के साथ

लगा जनम मरण का सब…

लगा जनम मरण का सब …

 इसके साथ सजा हैं मेरे

तभी अशांत मन में..

उठी पीर में याद आ गयी …

उस मजबूत बाहों की पकड़

जिसने उस रात झकझोर दिया था, मुझे

याद है उस रात की मलिन नग्नता भी  मुझे ..

उसके अधरों के चुम्बन की कसावट…

उस पल में भरी वो मिठास…

उसकी कल्पना से भरी प्रेम की प्रासंगिकता…

याद हैं आज भी मुझे…

उस हथेलियों की गर्माहट ने मुझे ..

प्रेम का वह परिणय सूत्र पहनाया…

संग मंत्रों से परे नई-शर्तों का रूप सिखाया ..

आज अनगिनत परछाइयों में उसने मुझे अपनाया…

समाज और परिवार की सब बातों से परे…

आज मुझे अपने जीवन का साथी बनाया…

कैसे भूलूँ उस समय का झुँझलापन…

सही बताऊं तो.. 

याद हैं आज भी मुझे…

नितांत गर्माहट का वो फलक …

आज इन नर्तक पैरों में ..नई धुन को भरकर..

पूछने लगा मुझे..

..की… 

किस गीत का भाव आज आएगा …

तभी उनकी अनुभूति ने ..शायद…

 फिर से झकझोर दिया मुझे…

आज फिर से फलक के अकेलेपन की वो बात…

याद आ गयी ….

आड़ में दूसरी शादी की बात …

बता मुझे दे गया वो … ये पीड़ित पल…

हे परमेश्वर किस नश्वरता का ये श्राप दिया आपने मुझे…

जब पास था तो दूर जाने की गति … 

ओर आज दूर जाकर मेरे उन पलों के दर्द की मति…

नई खोज में फिर से बना रही हैं एक अधर्मी मन को…

पनपा रही हैं एक अधर्मी मन को … 

जन्मा रही हैं एक अधर्मी मन…।

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