किन्नर

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Written By.: Akshay Ajay Behra


लिंग त्रुटि में जनित होने पर उनके
समाज अनोखा स्वांग रचता है
बेईमान परंपरा के तहत जो
उससे तालियों का व्यापार सजदा है

माथे में बिंदिया, हाँथो में चूड़ी
रूप कुछ यूँ वे सा मारते हैं
जिस्म की बनावट और वाणी में भिन्नता
कुछ इस तरह अपनी व्यथा से हारते हैं

किताबें, खिलौने जो छीन गए सब
आम ज़िंदगी की तृष्णा वे पालते हैं
फिर भी अपनी किस्मत कोस
दायरों के पिंजड़े में ज़िंदगी गुजारते हैं

खुशियों में आमंत्रित कर उन्हें हम
नुमाइशों को उनकी दुआएँ जानते हैं
ईश्वर का सृजन है वे, भूल कर
हम मनुष्य उन्हें धिक्कारते हैं

चंद सिक्कों की खातिर कई बार
जब वे सबके सामने नाचते हैं
फरियादें पूरी करने के चक्कर में
अपने स्वाभिमान का गला काटते हैं

उपेक्षित नजरों में भी वे
अपना खोया अस्तित्व तलाशते हैं
वो किन्नर है साहब
अपनी तमन्नाओं का कत्ल कर
दुआएँ बाँटते हैं।

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