इंसानियत पर चोट। “निर्भया”

0
265

By Amit Rastogi

सर्द रात के अंधेरे में घटना ऐसी घटी थी,

छः दरिंदों ने हैवानियत की रचना ऐसी रची थी।

फँसना था उनके जाल में किसी चिड़िया को उस दिन,

निकली थी उस राह पर वो अपने कदमों को गिन।

चली जा रही थी मासूम बेपरवाह और निडर,

आखिर ये भी हैं इंसान इनसे किस बात का डर।

गुनगुनाते हुए, मुस्कुराते हुए बढ़ती जा रही थी,

कल के कुछ के सपने मन में गढ़ती जा रही थी।

अगले पल होना है क्या इस बात से थी बेख़बर,

तभी अचानक पास उसके बस एक रुकी आकर।

थोड़ी सी हिचकिचाई फिर आगे बढ़ गयी,

किस्मत भी कहानी कुछ ऐसी गढ़ गयी।

एक बच्चा उतरा बस से और बजायी सीटी,

बोला कहाँ जाना है बस में बैठ जाओ न दीदी।

सुना जो शब्द ‘दीदी’ मन की खटास मिट गई,

बिना कुछ सोचे समझे बस में चढ़ गई।

चली जो बस तो शुरू हुआ अंतिम सफर,

हैवानियत ने पांव पसारे थे उस दिन इस क़दर।

सून-सान सड़क पर बस चली थी अपने चरम पर,

वो रात थी ग्रहण उस बेटी के शरम पर।

हैवानों ने पकड़ के बाल उसे पूरी बस में घसीटा,

कभी फाड़े कपड़े तो कभी मारा पीटा।

हाथ जोड़ कर कर रही थी विनती बार बार,

छोड़ दो मुझको, माँ कर रही होगी मेरा इंतज़ार।

हैवानों ने की हैवानियत की सारी हदें पार,

न मिला चैन तो कर दी लौह दंड योनि के पार।

बर्बरता के बाद जो लगा कानून का डर,

चलती बस से ही फेंक दिया मासूम को सड़क पर।

अधमरी सी पड़ी सबको आवाज़ दे रही थी,

संघर्ष की घड़ी में किसी अपने को याद कर रही थी।

हिम्मत के अनजाने हाथ बढ़े उसकी ओर,

जिन्होने पहुंचाया उसे जीवन के अगले छोर।

उस छोर पे कर रही थी मृत्यु उसका इंतज़ार,

देशभर में दौड़ी शोक की लहर अपार।

सुन कर एक बात आ गया सबको रोना,

जब बात उसने बोली “पापा मुझे और है जीना”।

रोयी थी इंसानियत मौत पर उसकी,

क्योंकि बन चुकी थी अब वह बेटी सबकी।

छोड़ी थी दुनिया खोकर उसने अपनी हया,

तब ज़माने ने उसे नाम दिया “निर्भया”।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here