राजनैतिक धर्मांधता के कारण क्वीर मूवमेंट को हो रही हानि

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– रित्विक दास

समलैंगिक समुदाय जोकि प्राय: सभी धर्मों में हाशिए पर है और सभी धर्मों में कम या ज्यादा तिरस्कृत है। उसकी  सबसे बड़ी शक्ति थी उसका धर्म जाति के बंधन से मुक्त रहकर एक समतामूलक दृष्टिकोण के साथ हर किसी को अपना लेने का कौशल जिसमें उनकी विधा निपुण थी।

और होती भी क्यों ना जो सदा से विषमलैंगिक लोगों को शरीर, लिंग के भेद से ऊपर प्रेम की पवित्रता का संदेश देता आया है भला वह स्वयं कैसे देह से जुड़े धर्म और जाति के बंधनों को महत्व दे सकता था।

परंतु निस्संदेह जब संपूर्ण भारत टुकड़ों में धर्म और जाति के नाम पर अलग हो रहा है, तो इस बात में कोई संदेह नहीं कि इसका प्रभाव भारत के क्वीर समुदाय पर भी पड़ा हैं।

जहां एक ओर विचारों के द्वंद हैं तो वहीं दूसरी ओर कट्टरपंथी विचारधारा भी अपने चरम पर हैं। घरों में अधिकार दिलाने का जिम्मा उठाने वाले कंधे अब अखाड़ों में अधिकार की मंशा रखने लगे हैं, धर्म हमेशा से ही पूंजीवाद का बेहद आत्मीय सहायक रहा हैं इस बात में कोई संदेह नहीं है, और जब सत्ता पक्ष भी इसमें अपनी शक्ति का समावेश कर देती हैं, तो सोने पर सुहागा……

धर्मांध समाज कभी भी सशक्त नहीं हो सकता यह एक अटल सत्य हैं। जहां धारा 377 के अभूतपूर्व निर्णय के पश्चात क्वीर समुदाय को सम्मिलित रूप से अपने अधिकारों की लड़ाई की तरफ तीव्र स्वर और उत्तिष्ठ भ्रिकुटिया के साथ आगे बढ़ना था, वही समुदाय आपसी मतभेदों में उलझने लगा हैं।

धर्म और संस्कृति हर मनुष्य के जीवन में एक अहम भूमिका रखती है, मनुष्य ने धर्म और संस्कृति को बनाया हो या ना हो, पर एक मनुष्य को बनाने में धर्म और संस्कृति का योगदान अवश्य रहता है।

परंतु जब लड़ाई सत्ता से हो और सत्ता ही धर्म का स्वरूप ले ले तो हमें इस बात को सुनिश्चित करना होगा कि कहीं हमारी धर्मांधता हमसे प्रश्न पूछने, सत्ता से लड़ने और उसका विरोध करने की स्वतंत्रता तो नहीं छीन रहा।

हमें इस बात पर भी ध्यान देना होगा की हमारे मुद्दे मानवीय हैं सिर्फ क्वीर आधिकारों की लड़ाई ही काफी नहीं होती अगर अधिकार की बात है तो हमें क्वीर समुदाय के अंदर जो और भी ज्यादा दबे हैं उनकी आवाज भी उठानी पड़ेगी, भारत जैसे देश जहां जातिवाद इतना अधिक मनुष्य को प्रभावित करता है आप यह नहीं सोच सकते कि दलित मुद्दों पर खामोश रहकर आप क्वीर मुद्दों को सजग रख पाएंगे।

इसी प्रकार हर मुद्दे पर आवाज उठाना ना सिर्फ नागरिक होने के नाते हमारा कर्तव्य है अपितु संपूर्ण रुप से हम इसके लिए स्वतंत्र हैं।

अंततः हमें इस बात पर विशेष गौर करना होगा कि कहीं आपसी वैचारिक मतभेद हमारे सालों की मेहनत पर और लड़ाई पर पानी ना फिर दे। संगठित, सशक्त और शिक्षित जागरूकता ही अधिकारों के रवि को भारत के आकाश पटल पर प्रकाशमान कर सकता हैं।

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